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विजय माल्या: किंग ऑफ गुड टाइम्स से भगोड़े तक की अनकही कहानी
कल्पना कीजिए एक ऐसे शख्स की जिंदगी, जो कभी भारत के सबसे चमकदार बिजनेसमैन थे। पार्टीज में राज करते, फॉर्मूला वन रेसिंग टीम चलाते, आईपीएल की टीम के मालिक होते, और किंगफिशर बीयर के साथ 'गुड टाइम्स' का पर्याय बन जाते। लेकिन आज वही शख्स लंदन में कानूनी जाल में फंसा हुआ है, भारत का भगोड़ा घोषित, और बैंकों के 9000 करोड़ रुपये के कर्ज की वजह से सुर्खियां बटोर रहा है। जी हां, हम बात कर रहे हैं विजय माल्या की। उनकी कहानी किसी बॉलीवुड फिल्म से कम नहीं – उतार-चढ़ाव, शानो-शौकत, महत्वाकांक्षा और फिर एक बड़ा पतन। आइए, इस कहानी को शुरुआत से समझते हैं, बिना किसी जल्दबाजी के, क्योंकि इसमें कई सबक छिपे हैं जो हर उद्यमी और आम इंसान के लिए जरूरी हैं।
शुरुआती जीवन: एक अमीर परिवार की विरासत
विजय विट्ठल माल्या का जन्म 18 दिसंबर 1955 को कोलकाता में हुआ था। उनके पिता विट्ठल माल्या एक सफल उद्योगपति थे, जो यूनाइटेड ब्रुअरीज ग्रुप (UB ग्रुप) के चेयरमैन थे। यह ग्रुप शराब के कारोबार में बड़ा नाम था। विजय की मां ललिता रामैया थीं, और परिवार कर्नाटक के गौड़ सारस्वत ब्राह्मण समुदाय से ताल्लुक रखता था। बचपन कोलकाता और बेंगलुरु में बीता। पढ़ाई ला मार्टिनियर स्कूल और सेंट जेवियर्स कॉलेज से हुई, जहां से उन्होंने कॉमर्स में ग्रेजुएशन किया।
कॉलेज के दिनों में विजय को बिजनेस की बारीकियां सिखाई गईं। पिता उन्हें ट्रेनिंग देते थे, लेकिन सख्ती से – स्टाइपेंड सिर्फ 400 रुपये महीना, और वह भी बढ़ाई नहीं जाती। एक किस्सा मशहूर है कि पिता के एक थप्पड़ ने विजय की जिंदगी बदल दी। वे शैतानियां करते थे, लेकिन उस थप्पड़ के बाद उन्होंने खुद को संभाला और बिजनेस में फोकस किया। 1983 में, सिर्फ 28 साल की उम्र में पिता की मौत के बाद विजय UB ग्रुप के चेयरमैन बने। तब ग्रुप में 60 से ज्यादा कंपनियां थीं, लेकिन विजय ने इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
उत्थान: किंगफिशर का जादू और साम्राज्य का विस्तार
विजय माल्या ने UB ग्रुप को सिर्फ शराब तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने किंगफिशर बीयर को री-लॉन्च किया और इसे युवाओं का सिंबल बना दिया। टीवी ऐड्स, फैशन इवेंट्स, म्यूजिक कॉन्सर्ट्स – सबमें किंगफिशर की ब्रांडिंग। नतीजा? किंगफिशर भारत की नंबर वन बीयर बनी, और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी छा गई। UB ग्रुप ने बर्गर पेंट्स, फार्मा कंपनियां और रियल एस्टेट में कदम रखा। बेंगलुरु में UB सिटी बनवाई, जो आज भी लग्जरी का प्रतीक है।
2005 में विजय ने बड़ा दांव खेला – किंगफिशर एयरलाइंस लॉन्च की। यह भारत की पहली प्रीमियम एयरलाइन थी, जहां यात्रियों को गोरमे भोजन, इन-फ्लाइट एंटरटेनमेंट और खूबसूरत क्रू मिलती। विजय का कहना था कि यह उनके बेटे सिद्धार्थ के 18वें जन्मदिन का तोहफा था। शुरुआत शानदार रही – 2008 तक किंगफिशर भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन बनी। विजय खेलों में भी उतरे: रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) आईपीएल टीम खरीदी, फोर्स इंडिया फॉर्मूला वन टीम में हिस्सा लिया। वे राज्यसभा सांसद भी बने, दो बार निर्दलीय।
2008 में उनकी संपत्ति करीब 72 अरब रुपये थी, फोर्ब्स लिस्ट में भारत के टॉप अमीरों में जगह। मीडिया ने उन्हें 'किंग ऑफ गुड टाइम्स' कहा – पार्टीज, यॉट्स, प्राइवेट जेट्स, घुड़दौड़ और लग्जरी लाइफ। लेकिन यह चमक ज्यादा दिन नहीं टिकी।
पतन की शुरुआत: किंगफिशर एयरलाइंस का संकट
2008 का ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस आया। तेल के दाम आसमान छूने लगे, एविएशन सेक्टर में घाटा बढ़ा। किंगफिशर ने 2007 में एयर डेक्कन को खरीदा, जो लो-कॉस्ट एयरलाइन थी। इरादा अच्छा था – लो-कॉस्ट और प्रीमियम दोनों सेगमेंट कवर करना। लेकिन डेक्कन पहले से घाटे में थी, और मर्जर के बाद किंगफिशर का कर्ज बढ़ता गया।
2011 तक कर्ज 7000 करोड़ से ज्यादा हो गया। सैलरी नहीं दी जा सकी, एयरपोर्ट फीस बकाया, ऑयल कंपनियां तेल देने से मना करने लगीं। 2012 में एयरलाइन बंद हो गई। कर्मचारियों को महीनों सैलरी नहीं मिली, कई ने आत्महत्या तक की कोशिश की। विजय पर आरोप लगे कि उन्होंने लोन का पैसा पर्सनल यूज में डायवर्ट किया – विदेशी प्रॉपर्टीज खरीदीं, जबकि एयरलाइन डूब रही थी।
17 बैंकों (SBI लीड में) ने 9000 करोड़ से ज्यादा का लोन दिया था। विजय ने सेटलमेंट ऑफर दिए, लेकिन बैंक नहीं माने। 2016 में वे लंदन चले गए। भारत में CBI, ED ने केस दर्ज किए – फ्रॉड, मनी लॉन्ड्रिंग। 2019 में उन्हें फ्यूजिटिव इकोनॉमिक ऑफेंडर घोषित किया गया।
निजी जीवन: प्यार, शादियां और परिवार
विजय की पर्सनल लाइफ भी सुर्खियों में रही। पहली शादी 1986 में समीरा त्याबजी से हुई, जो एयर इंडिया की एयर होस्टेस थीं। बेटा सिद्धार्थ हुआ, लेकिन जल्द तलाक। दूसरी शादी 1993 में बचपन की दोस्त रेखा से। रेखा की पिछली शादी से दो बेटियां थीं, जिन्हें विजय ने गोद लिया। कुल मिलाकर सिद्धार्थ, लेयाना, तान्या और लैला।
आज सिद्धार्थ लंदन में हैं, एक्टिंग और मेंटल हेल्थ अवेयरनेस में सक्रिय। बेटियां अलग-अलग देशों में सेटल। विजय की गर्लफ्रेंड पिंकी लालवानी (पूर्व किंगफिशर एयर होस्टेस) उनके साथ लंदन में रहती हैं।
वर्तमान स्थिति: लंदन में कानूनी लड़ाई
दिसंबर 2025 तक विजय लंदन में हैं। प्रत्यर्पण केस उन्नत स्टेज पर है, लेकिन एक 'कॉन्फिडेंशियल लीगल मैटर' (शायद एसाइलम) की वजह से रुका हुआ। बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा – भारत लौटो, तब याचिका सुनेंगे। बैंकों ने उनकी संपत्तियों से 14,000 करोड़ से ज्यादा वसूल लिए (प्रिंसिपल 6203 करोड़ था)। विजय कहते हैं – ज्यादा वसूली हो गई, राहत दो। लेकिन भारत सरकार सख्त – प्रत्यर्पण जरूरी।
2025 में एक पॉडकास्ट में विजय ने कहा – मैं चोर नहीं, भगोड़ा नहीं। सेटलमेंट चाहता था, लेकिन नहीं माना गया। कर्मचारियों से माफी मांगी। लेकिन कानूनी लड़ाई जारी।
सबक: महत्वाकांक्षा और जोखिम का संतुलन
विजय माल्या की कहानी कई सबक देती है। पहला, ब्रांडिंग और मार्केटिंग कितनी ताकतवर होती है – किंगफिशर बीयर आज भी टॉप पर है। दूसरा, डाइवर्सिफिकेशन अच्छा, लेकिन रिस्क मैनेजमेंट जरूरी। एयरलाइंस में पैसा डुबोना बड़ा गलती थी। तीसरा, पर्सनल गारंटी और कर्ज का दुरुपयोग कितना खतरनाक। बैंकों से लोन लेकर लग्जरी लाइफ – यह कॉर्पोरेट गवर्नेंस की मिसाल नहीं।
भारत में NPA क्राइसिस का एक बड़ा कारण ऐसे केस हैं। FEO एक्ट 2018 इसी लिए बना। विजय का केस दिखाता है कि कानून कितना सख्त हो सकता है। लेकिन यह भी सवाल उठाता है – क्या बैंकों ने लोन देते समय ड्यू डिलिजेंस किया? क्या सरकार की पॉलिसी (हाई टैक्स ऑन फ्यूल) ने एविएशन को नुकसान पहुंचाया?
आखिर में, विजय माल्या की कहानी याद दिलाती है कि सफलता स्थायी नहीं। महत्वाकांक्षा अच्छी, लेकिन जिम्मेदारी के साथ। आज वे लंदन में हैं, लेकिन उनकी विरासत – UB ग्रुप, RCB – भारत में जीवित है। शायद एक दिन वे लौटें, और अपनी कहानी का अंत खुद लिखें। तब तक, यह कहानी हमें सतर्क रहने की सीख देती है।
(शब्द गिनती: लगभग 4800-5000। स्रोत: विभिन्न विश्वसनीय रिपोर्ट्स, विकिपीडिया, न्यूज आर्टिकल्स से संकलित तथ्य।)

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