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बाइसन कालामाडन: फिल्म के मूल पात्रों की
गहराई से खोज
नमस्ते दोस्तों! आज हम बात करने वाले हैं एक ऐसी फिल्म की जो न सिर्फ खेल की दुनिया दिखाती है, बल्कि समाज की उन कड़वी सच्चाइयों को भी उजागर करती है जो आज भी कई लोगों की जिंदगी को प्रभावित करती हैं। जी हां, मैं बात कर रहा हूं 2025 की तमिल फिल्म बाइसन कालामाडन की, जिसे मारी सेल्वराज ने निर्देशित किया है। यह फिल्म रियल लाइफ कबड्डी प्लेयर मनाठी गणेशन की जिंदगी से प्रेरित है, जिन्हें उनके ताकतवर खेल की वजह से "बाइसन" या "कालामाडन" कहा जाता था। फिल्म में जातिगत भेदभाव, गांव की हिंसा और एक युवा की महत्वाकांक्षा की कहानी को बेहद संवेदनशील तरीके से बुना गया है।
मारी सेल्वराज की फिल्में हमेशा से समाज की गहराइयों में उतरती हैं – चाहे वह परियेरुम पेरुमाल हो, कर्णन हो या मामन्नन। बाइसन भी उसी परंपरा को आगे बढ़ाती है, लेकिन यहां खेल कबड्डी को माध्यम बनाकर एक स्पोर्ट्स ड्रामा का रंग दिया गया है। फिल्म की रिलीज के बाद क्रिटिक्स और दर्शकों ने इसे खूब सराहा है, खासकर ध्रुव विक्रम के परफॉर्मेंस को। लेकिन आज हमारा फोकस फिल्म के मूल पात्रों पर है – वे किरदार जो कहानी को जीवंत बनाते हैं, जो हमें सोचने पर मजबूर करते हैं और जो रियल लाइफ से जुड़े हुए लगते हैं। चलिए, एक-एक करके इन पात्रों को समझते हैं, उनके बैकग्राउंड, उनकी संघर्ष और फिल्म में उनकी भूमिका को।
मुख्य पात्र: "वनाथी" किट्टन (ध्रुव विक्रम)
फिल्म का केंद्रबिंदु है किट्टन, जिसे ध्रुव विक्रम ने इतनी शिद्दत से निभाया है कि देखकर लगता है मानो वे खुद मनाठी गणेशन बन गए हों। किट्टन एक दलित युवा है, जो दक्षिण तमिलनाडु के एक छोटे से गांव में रहता है। उसकी जिंदगी बचपन से ही संघर्षों से भरी हुई है – मां की मौत, पिता का डर और समाज की वो दीवारें जो उसे आगे बढ़ने से रोकती हैं। लेकिन किट्टन में एक आग है, कबड्डी खेलने की। वह मैदान पर "बाइसन" की तरह दहाड़ता है, विरोधियों को धूल चटाता है।
रियल लाइफ में मनाठी गणेशन 1990 के दशक में कबड्डी के स्टार थे। वे अर्जुन अवॉर्ड विजेता हैं और तमिलनाडु के लिए कई साल खेलें। फिल्म में किट्टन का किरदार उनकी जिंदगी से काफी हद तक मिलता-जुलता है – जाति के कारण होने वाला भेदभाव, गांव में हिंसा और खेल के जरिए ऊपर उठने की जद्दोजहद। ध्रुव ने इस रोल के लिए महीनों ट्रेनिंग की, बॉडी बनाई और गांव के लोगों से मिलकर लोकल एक्सेंट सीखा। क्रिटिक्स कहते हैं कि यह ध्रुव का अब तक का बेस्ट परफॉर्मेंस है – एक ऐसा गुस्सैल युवा जो अंदर से टूटता है लेकिन बाहर से स्टील जैसा मजबूत। किट्टन का डायलॉग, "मुझे कितनी दूर दौड़ना पड़ेगा जहां कोई बाड़ न हो?" – फिल्म की आत्मा है। यह पात्र हमें सिखाता है कि सपने देखना आसान नहीं, खासकर जब समाज आपको नीचे रखना चाहता हो।
पिता का किरदार: कंदासामी (लाल)
किट्टन के पिता कंदासामी को मलयालम एक्टर लाल ने निभाया है। यह पात्र बेहद इमोशनल है। कंदासामी एक सुरक्षात्मक पिता हैं, जो अपनी पत्नी की मौत के बाद बेटे को हर खतरे से बचाना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि किट्टन कबड्डी खेले, क्योंकि खेल में जातिगत हिंसा का डर है। लेकिन धीरे-धीरे वे बेटे के जुनून को समझते हैं।
यह रिलेशनशिप फिल्म का दिल है। पासुपति की तरह (जो फिल्म में एक और सपोर्टिंग रोल में हैं), लाल का परफॉर्मेंस इतना नेचुरल है कि देखकर आंखें भर आती हैं। रियल लाइफ मनाठी गणेशन के पिता भी ऐसे ही थे – वे चाहते थे कि बेटा पढ़-लिखकर सुरक्षित जिंदगी जिए, लेकिन खेल ने सब बदल दिया। कंदासामी का किरदार हमें याद दिलाता है कि माता-पिता का डर प्यार से ही आता है, और कभी-कभी उन्हें छोड़ना पड़ता है ताकि बच्चा उड़ सके।
प्रेमिका: रानी (अनुपमा परमेश्वरन)
अनुपमा परमेश्वरन रानी के रोल में हैं – किट्टन की बचपन की दोस्त और प्रेमिका। रानी एक मजबूत लड़की है, जो किट्टन का साथ देती है उसके संघर्षों में। फिल्म में उनका रोल सपोर्टिव है, लेकिन काफी इमोशनल डेप्थ वाला। अनुपमा ने इस रोल के लिए लोकल लोगों से दो महीने वर्कशॉप की, ताकि किरदार असली लगे।
रानी का पात्र फिल्म में रोमांस का तड़का लगाता है, लेकिन यह सिर्फ लव स्टोरी नहीं – यह दिखाता है कि प्यार कैसे मुश्किल वक्त में सहारा बनता है। कुछ क्रिटिक्स कहते हैं कि महिलाओं के रोल थोड़े कम हैं, लेकिन रानी का किरदार किट्टन की मोटिवेशन है। वह उसे याद दिलाती है कि जीत सिर्फ मैदान पर नहीं, जिंदगी में भी जरूरी है।
बहन: राजी (राजिशा विजयन)
राजिशा विजयन किट्टन की बहन राजी का रोल निभा रही हैं। राजी घर संभालती है, भाई का साथ देती है। फिल्म में उनका रोल छोटा लेकिन इंपैक्टफुल है – खासकर दो सीन में जहां वह भाई के लिए खड़ी होती है। राजिशा पहले भी मारी की फिल्म कर्णन में थीं, और यहां भी उनका परफॉर्मेंस सराहनीय है।
राजी का किरदार ग्रामीण महिलाओं की रियलिटी दिखाता है – जो घर की जिम्मेदारियां निभाती हैं, लेकिन अपने सपने दबा लेती हैं। यह पात्र हमें सोचने पर मजबूर करता है कि समाज में महिलाओं की भूमिका अभी भी कितनी सीमित है।
अन्य महत्वपूर्ण पात्र
फिल्म में पासुपति, अमीर सुल्तान और अझगम पेरुमाल जैसे एक्टर्स भी हैं। पासुपति का रोल किट्टन के मेंटर जैसा है, जो उसे खेल सिखाता है। अमीर और लाल के बीच का कॉन्फ्लिक्ट फिल्म में पॉलिटिकल टच देता है। ये पात्र जातिगत टेंशन को हाइलाइट करते हैं।
फिल्म में एक स्कूल टीचर का रोल भी है (मदन कुमार धक्षिणामूर्ति), जो किट्टन को मोटिवेट करता है। यह पॉजिटिव किरदार दिखाता है कि समाज में अच्छे लोग भी हैं जो बदलाव लाते हैं।
फिल्म के पात्र क्यों खास हैं
बाइसन के पात्र ओरिजिनल इसलिए लगते हैं क्योंकि वे रियल लाइफ से लिए गए हैं। मनाठी गणेशन खुद कहते हैं कि फिल्म उनकी जिंदगी का आईना है। मारी सेल्वराज ने हमेशा दलित संघर्ष को दिखाया है, और यहां कबड्डी के जरिए इसे और प्रभावी बनाया। पात्रों में गुस्सा है, दर्द है, लेकिन उम्मीद भी। ध्रुव का किट्टन गुस्से में स्टील जैसा है, लेकिन अंदर से संवेदनशील।
फिल्म 3 घंटे की है, लेकिन पात्र इतने जीवंत हैं कि बोर नहीं होते। संतोष नारायणन का म्यूजिक और सिनेमेटोग्राफी पात्रों को और गहराई देती है।
एक प्रेरणादायी कहानी
बाइसन कालामाडन सिर्फ एक स्पोर्ट्स फिल्म नहीं, बल्कि समाज का आईना है। इसके पात्र हमें सिखाते हैं कि जाति, गरीबी या हिंसा कितनी भी बड़ी क्यों न हो, जुनून और मेहनत से सब पार किया जा सकता है। मनाठी गणेशन जैसे रियल हीरो आज भी युवाओं को ट्रेन करते हैं, और यह फिल्म उनकी कहानी को अमर कर देती है।
अगर आपने फिल्म नहीं देखी, तो जरूर देखें। यह आपको हंसाएगी, रुलाएगी और सोचने पर मजबूर करेगी। तमिल सिनेमा की यह मिसाल है कि अच्छी कहानी और मजबूत पात्रों से कितना बड़ा असर डाला जा सकता है। क्या आपने फिल्म देखी? आपका फेवरिट पात्र कौन सा है? कमेंट्स में बताएं!

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