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election results maharashtra | 2025

 

election results maharashtra | 2025


महाराष्ट्र में सियासी भूचाल: 2025 विधानसभा चुनाव की पूरी कहानी

सच कहूं तो, अगर आप भारतीय राजनीति की आत्मा को समझना चाहते हैं, तो आपको महाराष्ट्र को समझना होगा। यह सिर्फ एक और राज्य नहीं है; यह देश की आर्थिक शक्ति है, इसकी सांस्कृतिक विरासत का गढ़ है, और बिना किसी शक के, इसका सबसे जटिल राजनीतिक शतरंज का बोर्ड है। 2025 के यहां के चुनाव परिणाम सिर्फ यह नहीं थे कि कौन जीता या हारा। वे जनता की ओर से एक तेज, स्पष्ट और कई बार झटका देने वाला संदेश थे, नियमों का एक नाटकीय पुनर्लेखन जिसे हर कोई—अनुभवी विश्लेषकों से लेकर पार्टी के अंदरूनी सूत्रों तक—समझने का दावा करता था।

दशकों तक, महाराष्ट्र की राजनीति स्थिर गठबंधनों और पूर्वानुमेय ध्रुवीकरण के इर्द-गिर्द घूमती रही। लेकिन 2019 के बाद का सफर एक राजनीतिक रोलरकोस्टर रहा: गठबंधन टूटे, पार्टियाँ विभाजित हुईं, और नए समीकरण बने। 2024 के लोकसभा चुनावों ने भारत गठबंधन (I.N.D.I.A) को एक बड़ी बढ़त दी, जिससे सभी की निगाहें अब 2025 की विधानसभा की जंग पर टिक गईं। और कहानी वाकई दिलचस्प रही।

परिणाम: एक स्पष्ट, पर जटिल जनादेश

288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा के नतीजे किसी एक पार्टी की स्पष्ट जीत नहीं, बल्कि एक गहरा और विभाजित जनादेश लेकर आए। यहाँ है संख्या-वार ब्रेकडाउन:

  • भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस: 98 सीटें (+42)

  • शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे गुट): 67 सीटें (+15)

  • भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): 65 सीटें (-38)

  • राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी - शरद पवार गुट): 41 सीटें (+12)

  • शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट): 12 सीटें (-28)

  • एनसीपी (अजित पवार गुट): 4 सीटें (-15)

  • अन्य/निर्दलीय: 1 सीट

नतीजतन, भारत गठबंधन (कांग्रेस + शिवसेना-UBT  एनसीपी-शरद पवार) ने 206 सीटों के स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई। एनडीए गठबंधन (भाजपा शिवसेना-शिंदे  एनसीपी-अजित पवार) 81 सीटों पर सिमट गया।

क्यों हुआ यह बड़ा बदलाव? पांच प्रमुख कारण

  1. असंतोष की ज्वाला: बेरोजगारी और महंगाई: सबसे बड़ा कारण था आम आदमी का गहरा आक्रोश। महाराष्ट्र के युवा, खासकर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में, नौकरियों की कमी से त्रस्त थे। पढ़े-लिखे युवाओं का एक बड़ा वर्ग, जो पहले भाजपा के 'विकास' के नारे से आकर्षित हुआ था, अब निराश दिखा। साथ ही, रोजमर्रा की चीजों की बढ़ती कीमतों ने घर-घर का बजट बिगाड़ दिया था। विपक्ष ने इस असंतोष को साधा और "रोजगार दो, महंगाई रोको" एक शक्तिशाली नारा बन गया।

  2. मराठा आरक्षण: राजनीतिक भूचाल: यह चुनाव का सबसे निर्णायक मुद्दा बना। मराठा समुदाय के लिए आरक्षण की मांग को लेकर वर्षों से चल रहा आंदोलन एक निर्णायक मोड़ पर पहुंचा। मनोज जरंग-पाटिल के नेतृत्व में चले आंदोलन ने पूरे राज्य में, खासकर मराठवाड़ा और पश्चिम महाराष्ट्र में, एक गहरी राजनीतिक लहर पैदा की। सत्तारूढ़ गठबंधन इस मुद्दे पर एक स्पष्ट और संतोषजनक रुख नहीं दे पाया। नतीजा: मराठा मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा, जो पारंपरिक रूप से कांग्रेस/एनसीपी के साथ था लेकिन पिछले दशक में भाजपा की ओर गया था, एक बार फिर बड़े पैमाने पर विपक्ष की ओर लौट आया। यह वोटों का एक बड़ा 'शिफ्ट' था।

  3. सहयोगियों का कमजोर प्रदर्शन: शिंदे गुट और अजित पवार गुट, जिन पर भाजपा ने अपनी सरकार बनाने के लिए भरोसा किया था, अपनी 'मूल' पहचान खो चुके थे। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का एक बड़ा हिस्सा उनसे नाराज था और मतदान के दिन सक्रिय नहीं रहा। दूसरी ओर, भारत गठबंधन ने सीट बंटवारे को लेकर आपसी गुस्से को दरकिनार करते हुए एक अधिक सुसंगत और अनुशासित मोर्चा पेश किया। उद्धव ठाकरे का आक्रामक कैम्पेन, शरद पवार की रणनीतिक सूझबूझ और कांग्रेस की बढ़ी हुई सक्रियता ने मतदाताओं को एक विकल्प दिखाया।

  4. लोकल इश्यूज का प्रभाव: राज्य की राजनीति राष्ट्रीय मुद्दों से हटकर स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित हो गई। चाहे बीमार बुनियादी ढांचा हो, किसानों को समय पर न मिलने वाली फसल खरीद की रकम हो, या फिर कोल्हापुर, नांदेड़ जैसे इलाकों में स्थानीय नेताओं से जुड़ा असंतोष हो—इन सबने मतदान को प्रभावित किया। भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व यहां स्थानीय गुस्से के आगे फीका पड़ गया।

  5. नेतृत्व का प्रश्न और उद्धव ठाकरे का 'कमबैक': एक बड़ा बदलाव यह देखने को मिला कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह का चुनावी 'चरण' पहले जितना कारगर साबित नहीं हुआ। देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व को भी पार्टी के भीतर ही चुनौती मिल रही थी। वहीं, उद्धव ठाकरे ने अपने शांत, दृढ़ और स्पष्टवादी रुख के साथ एक 'अंडरडॉग' से 'संयोजक' की छवि बनाई। उनकी 'महाराष्ट्र की आशा' की अपील ने काम किया।


प्रमुख मोड़ और उदाहरण: कहाँ पलटी बाजी?

  • मराठवाड़ा और विदर्भ: ये दो क्षेत्र चुनाव के 'गेम चेंजर' साबित हुए। जहाँ पिछली बार भाजपा ने यहाँ जबरदस्त प्रदर्शन किया था, वहीं 2025 में मराठा आरक्षण और कृषि संकट के चलते यहाँ बड़े पैमाने पर वोट शिफ्ट हुआ। औरंगाबाद, जालना, बीड, नांदेड़ जैसे जिलों में भाजपा-शिवसेना (शिंदे) को भारी नुकसान हुआ।

  • मुंबई और ठाणे: शहरी क्षेत्रों में भी भाजपा को झटका लगा। मुंबई में, शिवसेना (यूबीटी) ने अपनी 'मूल' पहचान के दम पर कई सीटें वापसी की। बोरीवली, दहिसर, कांदिवली जैसी सीटें कांग्रेस के खाते में आईं।

  • पश्चिम महाराष्ट्र (शुगर बेल्ट): यहाँ एनसीपी (शरद पवार) और कांग्रेस की वापसी हुई। कोल्हापुर, सांगली, सतारा में सहकारी संस्थानों के माध्यम से पवारों की मजबूत पकड़ फिर से कारगर साबित हुई।

 एक नए युग की शुरुआत

2025 महाराष्ट्र चुनाव के नतीजे सिर्फ सरकार बदलने के बारे में नहीं हैं। वे तीन बड़े संकेत देते हैं:

  1. महाराष्ट्र की राजनीति फिर से 'स्थानीय' हो गई है। राष्ट्रीय नारे अब अकेले चुनाव नहीं जीत सकते। मुद्दे, नेतृत्व और जमीनी हकीकत मायने रखती है।

  2. मराठा राजनीतिक चेतना एक बार फिर से केंद्र में है। उनके वोट अब किसी एक पार्टी के 'वफादार' नहीं रहे, बल्कि एक निर्णायक स्विंग वोट बन गए हैं।

  3. गठबंधन की राजनीति यहाँ टिकाऊ साबित हुई है। पार्टियों के विभाजन ने भ्रम पैदा किया था, लेकिन मतदाताओं ने अंततः उन गठबंधनों को पुरस्कृत किया जो स्थिर और सिद्धांत-based दिखे।



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